भूमिका – क्या सभी पूर्णिमा एक जैसी होती हैं? साल में 12 पूर्णिमा आती हैं, और हर पूर्णिमा का अपना महत्व होता है। परंतु आध्यात्मिक परंपराओं में अक्सर यह कहा जाता है कि इन 12 पूर्णिमाओं में से कुछ पूर्णिमा विशेष रूप से शक्तिशाली मानी जाती हैं। कई साधकों का अनुभव है कि इन दिनों ध्यान जल्दी गहरा होता है, मन शांत होता है और कभी-कभी भीतर ऐ…
Read more »भूमिका – जब चाँद पूरा होता है, तो मन क्यों बदल जाता है? कभी आपने ध्यान दिया है कि पूर्णिमा की रात का माहौल कुछ अलग ही होता है? आकाश में चमकता हुआ पूरा चाँद, हल्की चाँदनी और वातावरण में एक अनोखी शांति। बहुत से लोग महसूस करते हैं कि पूर्णिमा के आसपास उनका मन थोड़ा ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। किसी को सपने ज्यादा आते हैं, किसी को ध्यान…
Read more »भूमिका – सिर की दिशा और उसका महत्व हमारे जीवन में दिशा सिर्फ़ स्थानिक नहीं होती, बल्कि यह हमारे शरीर, चेतना और ऊर्जा से जुड़ी होती है। हर दिशा का एक विशेष महत्व है। यह महत्व तब और भी स्पष्ट होता है जब हम मृत्यु और जीवन के अंतर को समझते हैं। अक्सर लोग पूछते हैं : “ मरे हुए व्यक्ति का सिर क्यों उत्तर दिशा में रखा जाता है, जबकि जीवित व…
Read more »आने वाली सृष्टियों, अगली मानव सभ्यताओं और भविष्य क वैदिक युगों की रहस्यमय यात्रा भूमिका — जब भविष्य का द्वार वैदिक ग्रंथों में खुलता है ज़रा सोचिए… यदि कोई आपसे कहे कि मानव सभ्यता की आने वाली सात पीढ़ियाँ नहीं, बल्कि पूरी आने वाली सात सृष्टियों के बारे में जानकारी पहले से लिखी हुई है… …तो आपका मन कैसा प्रतिक्रिया देगा? चौंक जाएगा? य…
Read more »भूमिका — जब मनु का नाम सुनते ही दिमाग में एक ही सवाल उठ जाता है… हम सबने मनु का नाम सुना है, मनुस्मृति का ज़िक्र भी सुना है। लेकिन सच बताइए — क्या कभी आपके मन में यह सवाल नहीं उठा कि: ये मनु कौन थे? क्या मनु सिर्फ एक ही थे? या इससे भी बड़ा सवाल — क्या हर युग में एक नया मनु आता है? और अगर कई मनु हुए… तो कितने हुए? कब आए? क्या उनका रो…
Read more »1. भूमिका – एक ऐसा शब्द जो पूरी नियति बदल देता है कभी-कभी ज़िंदगी में हम ऐसे मोड़ पर खड़े होते हैं जहां न दिमाग चलता है, न रास्ते दिखते हैं, और न ही किसी इंसान की आवाज़ सुनाई देती है। लेकिन तभी भीतर से एक छोटी-सी रोशनी उठती है—और लगता है कि शायद कोई “ऊपर वाला” भी है, जो हमारे लिए कुछ कर सकता है। इसी एहसास का नाम है — “कुन फ़ाया”। एक…
Read more »1. भूमिका — जब मन थक जाता है चाहतों से कभी ध्यान दिया है आपने… मन तब नहीं टूटता जब जीवन कठिन हो जाता है— वह तब टूटता है जब मन की अधूरी इच्छाएँ ( over desire principle ) हमारी साँसों का बोझ बढ़ा देती हैं। हम पैसा, प्यार, सफलता जैसी चीज़ें नहीं चाहते— हम चाहते हैं कि यह सब हमें अंदर से पूरा कर दे। और जब यह नहीं होता, मन “Demand Mode” …
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