1. भूमिका – जब ‘गोरखधंधा’ शब्द सुनते ही मन झिझक जाता है
क्या आपने कभी गौर किया है कि कुछ शब्द सुनते ही दिमाग अचानक एक छवि बना लेता है?
जैसे ही कोई व्यक्ति कह दे —
“अरे ये तो बड़ा गोरखधंधा है!”
तो मन में तुरंत कुछ उलझा हुआ, रहस्यमय, अजीब-सा दृश्य उभर आता है।
पर क्या कभी सोचा कि इस शब्द का असली सच क्या है?
क्या गोरखनाथ जैसे महान योगी का सचमुच किसी “धंधे” से संबंध था?
या यह शब्द हमारे समाजिक मनोविज्ञान की कमजोरी का परिणाम है —
जहाँ हम जिसे समझ नहीं पाते,
उसे नकारात्मक टैग लगा देते हैं।
यही कारण है कि इस लेख को लिखना जरूरी था —
ताकि इस भ्रम को तोड़ा जा सके,
और गोरखनाथ जी के मार्ग को उसकी वास्तविक रोशनी में समझा जा सके।
2. गोरखनाथ जी कौन थे? – मानव नहीं, चेतना की लहर
गोरखनाथ जी को समझना मानो
अंधेरे कमरे में अचानक दीपक जलाने जैसा है।
नाथ परंपरा के सबसे प्रमुख योगी,
मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य,
और हठयोग के पुनर्संगठक।
उनका जीवन साधारण नहीं था —
वे चलते थे तो मौन बोलता था,
वे बैठते थे तो ऊर्जा चमकती थी।
उनकी साधना तीन स्तरों में बँटी थी:
1. शरीर की साधना
जहाँ शरीर को ध्यान का पात्र बनाया जाता है।
एक ऐसा शरीर जो रुकावट न बने,
बल्कि साधना का माध्यम बने।
2. प्राण की साधना
गोरखनाथ जी प्राण के विज्ञान में पारंगत थे।
उनके लिए प्राण केवल श्वास नहीं,
जीवन की गुप्त धारा थी।
3. चेतना की साधना
यह वह साधना थी जहाँ साधक
शरीर, मन और विचारों से ऊपर उठ जाता है
और शुद्ध अनुभव में प्रवेश करता है।
इतने गहरे मार्ग को
आम लोग कैसे समझ पाते?
3. गोरख योग क्या है? – रहस्य नहीं, अत्यंत सटीक विज्ञान
गोरख योग को लोग रहस्यमय मानते हैं,
पर वास्तव में यह एक सटीक आध्यात्मिक विज्ञान है।
इसमें कई शाखाएँ आती हैं:
हठयोग
जिसे आज दुनिया सीख रही है।
पर इसकी जड़ें नाथ योग में ही हैं।
प्राण-साधना (स्वर-विज्ञान, नाड़ी विज्ञान)
जहाँ साधक श्वास और ऊर्जा को नियंत्रित करता है।
आज neuroscience जिसको समझने में लगा है,
गोरखनाथ जी ने उसे अनुभव से सिद्ध किया था।
कुण्डलिनी जागरण
साधना का परम लक्ष्य —
भीतर सोई हुई चेतना को जगाना।
इस मार्ग में अनुशासन चाहिए,
धैर्य चाहिए,
और सच्ची खोज चाहिए।
पर समाज के लिए इतना धैर्य कहाँ?
उन्हें तो बस बाहरी तस्वीर दिखती थी —
और यही से शुरू हुआ गलतफहमी का खेल।
4. ‘गोरखधंधा’ शब्द का उद्गम – जब समझ कम हो, शब्द भारी हो जाते हैं
सच कहें तो —
“गोरखधंधा” शब्द समाज की समझ की हार है।
पुराने समय में जब लोग नाथ योगियों की साधना देखते:
- गहरी ध्यानावस्था
- लंबे उपवास
- अद्भुत श्वास नियंत्रण
- शांत लेकिन शक्तिशाली व्यक्तित्व
तो वे डर जाते थे।
उन्हें लगता था कि यह “अलौकिक शक्तियाँ” हैं,
जादू-टोना है,
या कोई गुप्त तंत्र है।
समाज ने जिसे समझा नहीं,
उसे ‘धंधा’ कह दिया।
पर असल में—
- न गोरखनाथ का धंधे से संबंध था
- न उनकी साधना कभी किसी छल से जुड़ी थी
- न नाथ पंथ में कोई तांत-टोटका था
गलती सिर्फ हमारी थी —
हमने गहराई को रहस्य समझ लिया।
5. समाज साधना को क्यों नहीं समझ पाया? – आध्यात्मिक मनोविज्ञान की परतें
यहाँ से आता है मनोविज्ञान।
मानव मन अक्सर तीन कारणों से आध्यात्मिक पथ को गलत समझता है:
1. अज्ञात का भय
जिस मार्ग को खुद न चला हो,
उससे डर लगता है।
2. सीमित दृष्टि
लोग साधना देखकर सोचते:
“कोई जादू है… कोई गुप्त शक्ति है…”
पर असल में वह केवल ध्यान है।
3. भीड़ मानसिकता
अगर एक व्यक्ति कह दे:
“ये सब धंधा है…”
तो बाकी लोग भी वही मान लेते हैं।
यह सामूहिक मानसिकता गोरखनाथ जी पर भी लागू हुई।
और नतीजा—
“गोरखधंधा” शब्द लोगों की जुबान पर चढ़ गया।
6. आज के युग में गोरख योग – पहले से ज़्यादा आवश्यक
आज की दुनिया थकी हुई है Harish।
मन बोझिल है।
नींद पूरी नहीं होती।
तनाव चरम पर है।
लोग भीतर से टूट रहे हैं।
ऐसे समय में जो मार्ग राहत दे सकता है—
वही गोरख योग है।
आज:
बड़े-बड़े वैज्ञानिक प्राणायाम पर रिसर्च कर रहे हैं
ध्यान (Meditation) कंपनियों में सिखाया जा रहा है
कुण्डलिनी जागरण पर किताबें लिखी जा रही हैं
यानी जिसे समाज ने “धंधा” कहा था,
आज दुनिया उसे विज्ञान का भविष्य मान रही है।
गोरखनाथ जी का मार्ग आज की पीढ़ी को
उसी तरह बचा सकता है
जैसे अंधेरे में एक दीपक उजाला देता है।
7. निष्कर्ष – समझ की कमी ने शब्द बदले, सच नहीं
अंत में बस एक ही बात—
- गोरखनाथ जी की साधना कभी धंधा थी ही नहीं
- ‘गोरखधंधा’ समाज की गलतफहमी है, साधना की नहीं
- आज वही मार्ग आधुनिक
विज्ञान की नींव बन रहा है
शब्द बदल सकते हैं,
पर सत्य नहीं।
और सत्य यही है—
गोरखनाथ जी की साधना
आज भी उतनी ही शक्तिशाली,
उतनी ही वैज्ञानिक,
और उतनी ही परिवर्तनकारी है
जितनी पहले थी।
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